स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव कमलप्रीत सिंह द्वारा जारी आदेश के अनुसार अब स्कूलों के संचालन और विकास से जुड़े निर्णयों में स्थानीय नेताओं और रसूखदारों की भूमिका सीमित होगी। नई व्यवस्था में समिति के 75 प्रतिशत सदस्य अनिवार्य रूप से स्कूल में अध्ययनरत बच्चों के माता-पिता या कानूनी अभिभावक होंगे। वहीं अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन भी अभिभावकों में से ही किया जाएगा।
नई एसएमसी को स्कूल विकास से जुड़े कई अधिकार दिए गए हैं। शौचालय मरम्मत, पेयजल व्यवस्था, बिजली-पंखों की मरम्मत, बाउंड्री वॉल सहित एक लाख रुपये तक के निर्माण एवं रखरखाव कार्य समिति सीधे करा सकेगी। इन कार्यों में स्थानीय स्व-सहायता समूहों की महिलाओं, प्रशिक्षित मिस्त्रियों, प्लंबर और इलेक्ट्रिशियन को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं।
महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए समिति में कम से कम 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य की गई है। साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और दिव्यांग विद्यार्थियों के अभिभावकों को भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व मिलेगा।
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए समिति की हर महीने बैठक आयोजित करना अनिवार्य होगा। किसी भी प्रस्ताव को मंजूरी देने के लिए कम से कम 50 प्रतिशत सदस्यों की उपस्थिति जरूरी होगी। बैठकों की कार्यवाही डिजिटल माध्यम से सार्वजनिक की जाएगी।
जिला स्तर पर निगरानी के लिए जिला मॉनिटरिंग समिति का गठन किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता कलेक्टर करेंगे। वित्तीय अनियमितता या लापरवाही मिलने पर संबंधित समिति के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। मध्यान्ह भोजन की निगरानी और स्कूल विकास की तीन वर्षीय कार्ययोजना तैयार करने की जिम्मेदारी भी एसएमसी को सौंपी गई है।
शिक्षा विभाग का मानना है कि नई व्यवस्था से सरकारी स्कूलों में पारदर्शिता, जवाबदेही और अभिभावकों की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा।

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