“पिता का सपना, बेटे ने किया पूरा: रितेश देशमुख बने छत्रपति शिवाजी, ‘राजा शिवाजी’ में दिखा शौर्य का स्वर्णिम अध्याय”

छत्रपति राजा शिवाजी सिर्फ एक नाम ही नहीं बल्कि देशभक्ति,सामाजिक उत्थान,अभूतपूर्व  का शौर्य का जीता जागता कोलाज हैं,सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं,पूरे देश में उनके स्वराज के स्वप्न,एवं मातृभूमि के आत्मसम्मान को बचाए रखने के प्रण को पूजा जाता है..! कुछ अरसे पहले जब स्वर्गीय विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे,तब उनकी दिली ख्वाहिश थी कि जब्बार पटेल जैसे सुधी निर्देशक की छत्रछाया में शिवाजी महाराज पर महाराष्ट्र सरकार की मदद से बड़ी फिल्म अनाउंस हो,पर किन्हीं कारणों से वो स्वप्न पूरा नहीं हुआ,तो अब उनके बेटे रितेश देशमुख ने छत्रपति महाराज की गरिमामय यात्रा को न सिर्फ सिल्वर स्क्रीन पे उकेरा,बल्कि फिल्म के निर्माता,लेखक और निर्देशक के साथ साथ  स्वयं शिवाजी का रूप धरके इस कृति के माध्यम से अपने स्वर्गीय पिता को श्रद्धांजलि भी दी..!
कथा/पटकथा/संवाद/शोध : फिल्म की कथा 1600 ईस्वी में राजा शिवाजी और उनके शौर्य  के इर्द-गिर्द लिपटी नजर आई,राजा शिवाजी की युद्ध शैली पर पहले भी बहुत शोध हुए हैं पर फिल्म के अंत में राजा शिवाजी की उस बहादुरी का भी जिक्र है,जो उन्हें चंद गद्दारों की तरह "भगोड़ा" नहीं "सच्चा शूरवीर" ठहरता है। पटकथा थोड़ी बिखरी बिखरी सी थी और संवाद भी उतने प्रभावी नहीं थे,पर फिल्म और उसकी कथा को अतिरिक्त महिमा मंडित करने की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि ओरिजिनल कहानी ही सशक्त और दमदार है 
कहानी : कथा की शुरुआत होती है,शिवाजी महाराज के पूर्वजों की दोस्ती के नाम पर अब्दल शाही में हत्या,तो दूसरी तरफ शिवनेरी में शिव बा का जन्म,जिनके भीतर स्वराज का स्वप्न न सिर्फ उनकी मां जीजाबाई (भाग्यश्री), एवं पिता (सचिन खेडेकर) बल्कि बड़े भाई शंभू राजे (अभिषेक बच्चन) ने पहले ही बो दिये थे,मुगलो के साथ अब्दल शाही के शहंशाह अब्दल शाह (अमोल गुप्ते) के बीच अपमान के घूंट पीकर भी शाहजी राजे भोसले  ने अपने बच्चों में क्रांति के बीज डालें,अब्दल शाह जितने कइयां थे,उससे कहीं ज्यादा उनकी बड़ी बेगम साहिबा (विद्या बालन) जो अपने सेनापति सूबेदार अफजल (संजय दत्त) से धोखे से शंभू राजे की हत्या करवाती हैं, इसके बदले जीजामाता अपने छोटे पुत्र शिवा से अफजल का कटा सर मांगती हैं,मुगलों के साथ-साथ अब्दल शाही के खिलाफ अपने मोर्चे में,छोटी सी सैन्य टुकड़ी के साथ, शिवाजी महाराज ने किस तरह अफजल का सर कलम कर,उसे मां के चरणों में पेश किया, साथ ही किस तरह मराठा साम्राज्य को भगवा के तले आगे बढ़ाया,ये देखने के लिए आपको थिएटर जाना पड़ेगा।  
निर्देशन/संपादन : निर्देशन और लेखन के साथ-साथ अभिनय करना,वो भी शिवाजी महाराज की जीवनी पर,तो ये इतना आसान नहीं था,बड़े नाम के साथ अक्सर कंट्रोवर्सी क्रिएट हो जाती है,यहां तक कि एक बड़े चैनल ने इस पे धारावाहिक की घोषणा की थी,पर बढ़ती कंट्रोवर्सी के चलते इसे रोक दिया गया था,इन सभी तथ्यों से सावधान रितेश ने फिल्म में उम्दा निर्देशन किया है,साथ ही मुख्य किरदार को बड़े ही मनोयोग से गढ़ा है,पर कहीं-कहीं वे सशक्त होने के बावजूद,थोड़े हताश और नरम नजर आए. फिल्म के संपादन को भी कहानी में कहीं-कहीं कसावट की जरूरत है!
अभिनय : अभिनय की दृष्टि से,रितेश देशमुख की तारीफ करनी ही पड़ेगी क्योंकि उन्होंने जान लगा दी है,अपने इस आराध्य के किरदार को जीवंत करने में,हालांकि शिवाजी के रूप में इससे पहले महेश मांजरेकर और शरद केलकर को तानाजी में देखना सुखद अहसास रहा है,पर शिवाजी महाराज की अच्छाई मानो रितेश देशमुख ने घोंट के पी ली है इस फिल्म में,उनकी जीवन संगिनी सई महारानी के रूप में जिनिलिया खूब सजी हैं।जीजाबाई के रूप में भाग्यश्री भी,पर भाग्यश्री इस दमदार भूमिका के लिए थोड़ी सुकोमल ज्यादा लगी, सशक्त थोड़ी सी कम!संजय दत्त की तरह,विद्या बालन भी छा गईं अपने नेगेटिव किरदार में,दूसरी तरफ शिवाजी महाराज के बड़े भाई के किरदार में अभिषेक बच्चन भी जंचें हैं,महेश मांजरेकर और सचिन खेडेकर के बारे में क्या कहना,दोनों मंजे हुए कलाकार हैं। गेस्ट अपीयरेंस में शिवाजी के अंगरक्षक के रूप में सलमान खान और औरंगजेब के पुत्र के रूप में फरदीन खान अच्छे लगे,सलमान के फाइट वाले दृश्य थोड़े और अच्छे हो सकते थे.
सिनेमैटोग्राफी /आर्टवर्क : संतोष सिवन द्वारा की गई फिल्म की सिनेमैटोग्राफी बहुत सशक्त है,बेहतरीन आर्ट डायरेक्शन इसमें चार चांद लगा देता है,आर्ट डायरेक्शन में उस काल का उम्दा शोध कार्य साफ दिखाई देता है!
स्टंट /कोरियोग्राफी : फिल्म लड़ाका मराठी राजा की गौरवशाली पृष्ठभूमि पर आधारित है जिसकी सेना गोरिल्ला लड़ाई में भी दक्ष थीं, तो उसे फिल्माने में फाइट मास्टर्स श्रेष्ठ साबित हुए, यही नहीं स्वयं शिवाजी जितने दयालु और परोपकारी थे,उतने ही शूरवीर,दमदार और समर्थ नायक तो जाहिर सी बात है स्टंट भी काफी तगड़ा होना था! स्वयं विकी कौशल जो फिल्म छावा में छत्रपति के पुत्र संभाजी की भूमिका निभा चुके हैं ने स्वीकारा कि,उन्होंने मराठी सिनेमा में इतना जबरदस्त स्टंट अब तक नहीं देखा, रिमो डी'सोजा की कोरियोग्राफी भी काफी अच्छी थी.!

म्यूजिक/ बैकग्राउंड स्कोर : फिल्म के म्यूजिक की डोर,गर अतुल अजय जैसे जाने माने मराठी संगीतकारों और गीतकार मनोज मुंतशिर के हाथों में हो तो म्यूजिक का जोशीला और गजब का होना स्वाभाविक ही है,लॉन्च में अजय ने रोते हुए कहा शिवाजी उनके लिए देव तुल्य है और टायटल ट्रैक देव पर प्रसाद चढ़ाने तुल्य है,वाकई फिल्म का टाइटल सॉन्ग "एक शस्त्र एक वस्त्र" बहुत ही खूबसूरत,रोंगटे खड़े कर देने वाला है,फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी बहुत ही उम्दा है, बिल्कुल वैसा जैसा एक पैट्रियोटिक फिल्म में होना चाहिए!

क्यों देखें : शिवाजी महाराज जैसे शूरवीर राजा की कहानी में इतने उतार-चढ़ाव और चौंकाने वाली प्रमाणिक शौर्य गाथाएं हैं कि उन्हें हर देशवासी द्वारा देखा जाना चाहिए, जिस तरह संभाजी को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया,उसी तरह शिवाजी को भी दर्शकों का प्यार मिले,यही शुभकामना है।

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