अयस्क और पानी बस्तर का, स्टील प्लांट लग रहा आंध्र में! 1.4 लाख करोड़ का संयंत्र, 55 हजार बेरोजगारों का छिना रोजगार

जगदलपुर, 24 मई 2026। छत्तीसगढ़ सरकार जहां बस्तर को नक्सल मुक्त कर औद्योगिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर बस्तर का लौह अयस्क और जल संसाधन दूसरे राज्य के औद्योगिक विकास में इस्तेमाल होने को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आर्सेलर मित्तल निप्पोन स्टील (AMNS) आंध्र प्रदेश के अनकापल्ली में 1.4 लाख करोड़ रुपये की लागत से देश का सबसे बड़ा स्टील प्लांट स्थापित करने जा रही है। इस परियोजना के लिए बैलाडीला की खदानों से लौह अयस्क और बस्तर क्षेत्र के जल स्रोतों का उपयोग किया जाएगा। ऐसे में स्थानीय लोगों के बीच यह बहस तेज हो गई है कि जब संसाधन बस्तर के हैं तो उद्योग भी यहीं क्यों नहीं लगाया जा रहा।
24 मिलियन टन सालाना उत्पादन क्षमता
अनकापल्ली में प्रस्तावित इस विशाल स्टील प्लांट की वार्षिक उत्पादन क्षमता 24 मिलियन टन बताई जा रही है। इसके लिए बैलाडीला की खदानों से करीब 36 लाख टन लौह अयस्क की आपूर्ति की जाएगी। कंपनी के अनुसार जनवरी 2029 तक पहले चरण का उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। आंध्र प्रदेश सरकार इस परियोजना को राज्य के औद्योगिक विकास की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।
रोजाना 20 हजार टन अयस्क की ढुलाई
जानकारी के अनुसार किरंदुल स्थित एनएमडीसी खदानों से प्रतिदिन लगभग 20 हजार टन लौह अयस्क चूर्ण स्लरी पाइपलाइन के जरिए विशाखापट्टनम स्थित प्लांट तक पहुंचाया जा रहा है। वहीं सुकमा जिले की शबरी नदी और दंतेवाड़ा क्षेत्र के मदाड़ी नाले से उद्योग के लिए भारी मात्रा में पानी लिया जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि संसाधनों के उपयोग के बावजूद बस्तर क्षेत्र को अपेक्षित रोजगार और विकास का लाभ नहीं मिल पाया है।
प्रदूषण और खेती पर असर के आरोप
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि लौह अयस्क प्रसंस्करण से निकलने वाले अपशिष्ट के कारण दंतेवाड़ा जिले की सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि प्रभावित हुई है। नदी-नालों के प्रदूषित होने और खेती योग्य जमीन बंजर बनने की शिकायतें भी सामने आई हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उद्योग से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान का खामियाजा बस्तर को भुगतना पड़ रहा है, जबकि आर्थिक लाभ दूसरे राज्य को मिल रहा है।
गर्मियों में बढ़ी पानी की चिंता
गर्मी के मौसम में जल संकट के बीच उद्योगों को पानी आपूर्ति का मुद्दा भी अब बड़ा सवाल बन गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट बना रहता है, तब उद्योगों के लिए हजारों क्यूसेक पानी उपलब्ध कराना उचित नहीं माना जा सकता। ट्रिब्यूनल स्तर पर भी छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच जल उपयोग को लेकर चर्चा चल रही है।
रोजगार को लेकर उठे सवाल
बस्तरवासियों का कहना है कि यदि लौह अयस्क खनन और जल स्रोतों का उपयोग बस्तर से हो रहा है, तो उद्योग भी दक्षिण बस्तर में स्थापित होना चाहिए था। उनका दावा है कि इससे क्षेत्र के करीब 55 हजार बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिल सकता था। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि खनन क्षेत्र बस्तर में होने के बावजूद कंपनी का मुख्यालय हैदराबाद में होने से अधिक राजस्व और रॉयल्टी का लाभ आंध्र प्रदेश को मिल रहा है।

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